सावन की यादें

आये बादल घटा है छाई, पवन मचाये शोर है।
पंछी गाते भँवरे गुनगुनाते, और नाचे मोर  है।।
बारिश आई झमझम करती, सावन  का  महीना है।
इस सावन में जो न भीगा, क्या मरना क्या जीना है।।

बारिश की रिमझिम बूँदों में, देखा तेरा भीगा बदन।
देखकर तेरी तरसी निगाहें, बहक उठा मेरा तनमन।।
सर्दी गुरनम बहकी हवायें, मन विचलित कर बैठा हूँ।
आ जाओ ख्वाबों में मिलने, कबसे प्यासा मेरा मन।।

सावन की बूँदे पड़ीं जब, तब इस बदन में आग लगी।
मिलना तुझसे नहीं है मुमकिन, फिर भी मन में आस जगी।।
सावन है या कोई जादू , बिन खिंचे चला मैं जाता हूँ।
बैठा हूँ दरिया के भवँर में, फिर भी इस दिल मे प्यास लगी।।

                                   -बालकवि जय जितेन्द्र
                                    रायबरेली(उत्तर प्रदेश)

Comments

Popular posts from this blog

भारत माँ की ललकार

उलझा हुआ प्यार