कोरोना से क्या रोना

मर गए न जाने कितने मजदूर पैदल चलकर,
तब कहां गए थे गरीबों से वास्ता रखने वाले।
हम तो मजदूर थे हमारा क्या कसूर था,
जो आकर मार डाला विदेशों में नास्ता करने वाले।।


एक पल  में  अपने-पराये  की  पहचान  करा  दी,
जो आजतक न समझ पाये वो हर बात सिखा दी।
यह कोरोना नहीं जीवनशैली बतलाने वाला चिराग है,
जो एक चुटकी में अच्छे-अच्छो की औक़ात दिखा दी।।


कोरोना तो यूँ ही बदनाम है दुनिया में,
कहीं न कहीं हम भी सब कुसूरवार है।
प्रकृति के साथ हम खेलें तो ठीक  है,
प्रकृति हमारे साथ खेले तो गुनहगार है।।


कोरोना तो बस एक बहाना है,
असली मकसद तो हमें सुधारना है।
अभी वक़्त है सुधर जाओ वरना,
हमसब को ऐसे ही दिन गुजारना है।।
              
   - बालकवि जय जितेन्द्र
      रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

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